लघुकहानी : घर

 

लघुकहानी : घर

सरण राई


भव्य कार्यक्रम में हिस्सा लेकर खुशी का बोझा मन में लिए हुए देर शाम घर लौट रहा हूँ। इस खुशी का बोझा किसे दूँ, किसे समझाऊँ?
मन में ही गुम्स कर सड़ने और तुहने लगा है।
इक्कतालीस साल की आदत, घर की ओर खिंचने वाली। जल्दी-जल्दी घर लौटने की आदत। पर अब घर पहुँच कर दिनभर के सुख-दुख को बांटने-सुनने वाली पत्नी नहीं है। एक अकेला जीवन...
घर पहुँचने की जल्दी में कदम अनायास डगमगा जाते हैं। मन के भीतर कुछ उमड़ने-घुमड़ने लगता है। स्वर्गवासी पत्नी की यह चाहत थी कि, “मैं हमेशा सुखी और प्रसन्न रहूँ।” उसी बात को निभाने का मैंने संकल्प लिया था कि जब तक जीऊँगा, उसे निभाऊँगा। नए कपड़े पहनकर, सुंदर और सजीला दिखने का प्रयास करते हुए, प्रसन्न रहने के इरादे से आज सुबह निकला था। दिनभर लोगों के बीच खुशी और प्रसन्नता दिखाता भी रहा।
लेकिन अब घर जाने का मन नहीं करता। वह घर, जिसमें पत्नी नहीं है, मगर उनकी यादें समाई हुई हैं।
कदम और मन डगमगा जाते हैं— कहाँ जाऊँ? जहाँ भी जाऊँ, घर जैसा कुछ नहीं।
हाँ, शायद ऐसा ही है... जीवनसाथी न हो तो क्या घर भी घर नहीं रहता?

 

 

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