छोटी-छोटी बातों की खुशी
(लघुकथा) छोटी-छोटी बातों की खुशी सरण राई सुबह-सुबह जब मैं इंसुलिन लगाता हूँ, तो अपनी दिवंगत पत्नी की याद आ जाती है। याद आने का कारण है इंसुलिन पेन — वही पेन जिससे उन्होंने भी एक साल तक इंसुलिन लगाई थी। उनके देहांत के बाद वह पेन मैंने नहीं फेंका, सँभालकर रख दिया था। पत्नी का निधन मधुमेह के कारण गुर्दे खराब होने और डायलिसिस के दौरान हुआ था। मुझे भी कई वर्षों से मधुमेह है, इसलिए डर रहता है कि कहीं मेरे भी गुर्दे खराब न हो जाएँ। इसी डर से मैंने उसी पेन से इंसुलिन लगाना शुरू किया जो पत्नी ने इस्तेमाल किया था। बुढ़ापे में, कोशिश करने पर भी कई बातें भूलने लगती हैं। कल इंसुलिन लगाने के बाद मैंने पेन को बिना ढक्कन लगाए फ्रिज में रख दिया। आज जब इंसुलिन लगाने गया तो देखा — पेन का ढक्कन गायब है। पूरा कमरा खोजा, पर ढक्कन नहीं मिला। दस साल पहले १२०० रुपये में खरीदा गया वह पेन! अब नया खरीदना पड़ेगा। सोचा, शायद ढक्कन कहीं मिल जाए। बहू ने कमरा बुहारकर कूड़ा फेंका था — उसी ढेर में देखने के लिए आँगन में गया। दरवाजे के सामने ही ढक्कन लुढ़का पड़ा था। बहू ने शायद उसे किसी बेकार पेन का...