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Showing posts from January, 2025

जीवन... चलते रहना, चलते रहना

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  जीवन... चलते रहना, चलते रहना सांसारिक दबाव से दबकर गिरकर एक छोटे से घेरे में कैद हो जाता है। कैदी जीवन, प्यारा यह मोहक जीवन, अगर खींचकर इसे पूरा जी सकते, तो कितना अच्छा होता। जीवन को आकाश में उड़ने का सुख मिलता, जब तक मन भर न जाए। चलते रहना, चलते रहना... जब तक थक न जाएं चलते रह सकते! जीवन एक बार मिला है, जैसा भी है, जैसे भी जी रहे हैं। जीना बड़ी बात है, यही जीने से मधुर सृष्टि की सुंदरता को छूने का अवसर मिला है। छोटे से घेरे की परिधि में ही सही, जब तक मन भर न जाए, उड़ने का सुख मिलता। चलते रहना, चलते रहना... जब तक थक न जाएं चलते रह सकते!    

जीवन परीक्षा

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  जीवन परीक्षा जीवन का हर पल, हर घड़ी परीक्षा की घड़ी। उन्नति, अवनति, आरोह, अवरोह, चढ़ाई, उतराई, उजाला, अंधेरा, प्रेम, घृणा, जीत–हार, संघर्ष और संग्राम की घड़ी। क्या, कौन और किसका महत्व है? टॉल्सटॉय को मन में संजोकर जो भी, जहाँ भी, जिस क्षेत्र में हो, योध्दा बनकर वीरता से लड़ते रहना। अगर डार्विन सत्य है, तो लड़ते-लड़ते मंज़िल तक पहुँचना ही जीवन है। जीवन परीक्षा में उत्तीर्ण होना है, और जीवन परीक्षा ही है। परीक्षा जीवन है। जीवन परीक्षा में उत्तीर्ण होने वालों के हिस्से में सुख, आनंद, मनोरंजन, उपलब्धि, ऊँचाई, महानता आ सकती हैं— पर यह सोचना कि यही सब कुछ है, अज्ञानता का भ्रम हो सकता है। परीक्षा में असफल लोग भी जीवित हैं, संतोष के साथ जीवन के बाग में फूलों की तरह मुस्कुरा रहे हैं। दुनियावी जीवन की सुंदरता सक्रियता, सेवा, संयम, और धैर्य में है। दिल में दर्द छुपाकर धीमे-धीमे मुस्कुराना ही महानता है। परीक्षा तो हर समय, हर पल जीवन है। कहाँ नहीं है परीक्षा? कहाँ नहीं ली जाती परीक्षा? परीक्षा प्रेम में ली जाती है, घृणा में भी जाँचा जाता है। प्रेम कितना गहरा है, प्रेमिका यह जानना चाहती है। हर...

क्या कैसा?!

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  क्या कैसा?! सिकुड़ते-सिकुड़ते छोटा, सूक्ष्म, अदृश्य, अगोचर हो गया हूँ फैलते समय ब्रह्मांड से भी बड़ा, अपार विशाल हो जाता हूँ मुझे कैसा होना चाहिए? अगोचर या अपार?! जब अपने अंदर खोजता हूँ तो एक सम्पूर्ण, सुंदर, चमकता हीरा पाता हूँ बाहर संसारिकता में खोजता हूँ तो रोता हुआ बेचारा बच्चा मिलता है तो मैं क्या हूँ? हीरा या कीड़ा? या दिल के टूटे हुए टुकड़े?!

स्वांग

  स्वांग सरण राई सम्भ्रांत और संपन्न समाज ने कभी उसकी और उसके योगदान की कद्र नहीं की। वह सोचता था कि अपने समाज के लिए कुछ करेगा। उसने अपने समाज की ओर नजर दौड़ाई। वह समाज, जो उस संपन्न समाज से बिलकुल अलग था—लूला, लंगड़ा, गूंगा, बहरे, गठिया से पीड़ित अशिक्षितों का समाज, जो हमेशा पिछड़ा हुआ था। उस समाज को किसी की कद्र करना आता ही नहीं था। सम्मान और सराहना की प्यास बुझाने के लिए उसने एक अधेड़ गठिया रोगी से अपना सम्मान समारोह आयोजित करवाया। लूले, लंगड़े, गूंगे, बहरे, गठिया से पीड़ित अशिक्षित लोग वहां इकट्ठा हुए। कार्यक्रम अराजक होना तय था। विकलांग लोग अपनी ही धुन में लगे थे। फूल-माला पहनाने आता हुआ एक लंगड़ा व्यक्ति गिरकर घायल हो गया। एक बेवकूफ ने वह माला पहनकर "ह्याह्याह्या" किया। गूंगा व्यक्ति "हीहीही" करके हंसते हुए हिल गया। बाकी लूले, लंगड़े, गूंगे, बहरे, गठिया पीड़ित अशिक्षित लोग कोई चलते, कोई गिरते-पड़ते, तो कोई चिल्लाते, हंसते रहे। गठिया पीड़ित समाज! यह कार्यक्रम किस चीज का था? सम्मान पाने के लिए बैठा वह, तभी एक बेवकूफ आकर उस पर थूक देता है। वह गुस...

तीन कविता - १‍‍ .बुढ़ापा ,२.ये मरणशील शरीर, ३.सकते हो?

  बुढ़ापा सरण राई अब मुझे कहीं जाना नहीं है, क्योंकि मेरे पास जाने की ताकत नहीं है। अब मेरा कोई गंतव्य नहीं है, क्योंकि मेरे पास अब कोई चलने की शक्ति नहीं है। मुझे किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं है, क्योंकि मेरे पास भोगने की क्षमता नहीं है। फिर भी इस मन की बेचैनी खत्म नहीं हुई है, जीवन क्या है, इसका पता नहीं चल सका है। बुढ़ापा प्यारा नहीं होता, लेकिन उसे यूँ ही छोड़ा नहीं जा सकता। जीवन जीने का मजा, अंतिम निवाले का मजा! ये मरणशील शरीर सरण राई सारे काम छोड़कर जब आराम कर रहा हूं, सोचता हूं, क्या-क्या गलतियां की इस जीवन में? भूख से मर जाएंगे, डरते-डरते जीते रहे। एक वक्त का खाना मिल जाए तो एक दिन जी लेंगे, ऐसा कहा। एक-एक दिन खींचकर, खींचकर जीते रहे। एक-एक वक्त के लिए दिन-रात हड्डी-पसली तोड़ते रहे। आसान नहीं था जीवन का पहिया घुमाना, पर जोर लगाकर खींचते रहे। कष्ट पर कष्ट, कब तक खींचना पड़ेगा? (जानबूझकर पाप नहीं किया भूखे वक्त, गलतियां हुईं भूखे वक्त। माफ कर देना... ये मरणशील शरीर को याद करके!) सकते हो? सरण राई मरने के बाद जितनी बार मार सकते हो, मारो! मरने के बाद जितनी बार मारो, चलेगा। पर... ज...

कविता: लेकर जाने के होगा?

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  कविता:  लेकर जाने के होगा?   सरण राई मैं यहाँ इस तरह खो गया जैसे जंगल में एक पत्ता, जैसे मरुभूमि में एक कण, जैसे समय के अंतराल में एक क्षण। एक कण का क्या महत्व, एक क्षण का क्या महत्व। लेकिन, दोस्त, कणों का ढेर ही तो मरुभूमि है, क्षणों की अनवरत धारा ही समय है, बूंदों का जमावड़ा ही समुद्र है। मैं एक बूंद सूखकर जाने वाला, एक कण उड़कर जाने वाला, एक क्षण बीतकर जाने वाला। प्रतिमा हूँ या प्रतिबिंब, मैं...? क्या लेकर आया था लेकर जाना क्या होगा? क्या लेकर जा सकूँगा? सबकुछ यहीं था, मेरा है यह भ्रम पाल रखा। दोस्त, अब भी मुझे भ्रम है, आखिर, लेकर जाने के होगा?    

मैं कहाँ अकेला हूँ?

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  कविता: मैं कहाँ अकेला हूँ? सरण राई क्या तुम अकेले चल रहे हो? हाँ, शायद मैं अकेला दिखता हूँ चलते-चलते मैं अकेला हो गया और चलता रहा अनगिनत दिशाओं में बहते हुए अलग हो गया। भूखे-प्यासे, दुबले-पतले युवाओं के साथ चला था खाना देखकर शायद खींचा-तानी मे बिछड़ गए हम ‍‍‍... खाने वाले आगे निकल गए, न पाने वाले पीछे छूट गए पेट भरने की ज़िंदगी का सहारा ढूंढते निर्मम, निर्दयी अनवरत यात्रा के बीच में मैं अकेला हो गया या बूढ़ा हो गया।... चतुर लोग आगे बढ़ गए, मासूम पीछे छूट गए इस अनवरत यात्रा में मैं अकेला हो गया।... लेकिन, कहाँ, मैं कहाँ अकेला हूँ? मेरे साथ चल रहे हैं सुंदर विचार, मनोहर आस्थाएँ कड़वे-मीठे अनुभव, समय की सीखें मनुष्य के पवित्र, स्वच्छ, मीठे सपने लहर कभी अकेली होती है क्या? मेरे पास हैं मैं और मेरा मैं अकेले का विशाल सृष्टि भंडार मेरे चारों ओर घूमता मनोरम अदृश्य संसार चलने वाला मैं, चलते रहने वाला मैं मुझे चलाने वाला मैं मैं कहाँ अकेला हूँ? मैं अकेला एक सशक्त समूह, समुदाय, समाज। एक संस्था, पूर्ण विवेक, अंतरात्मा की आवाज़। सुंदर भावना, सुंदर रचना, सुंदर जीव...

मुरझाने वाला फूल

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  मुरझाने वाला फूल सरण राई चलती ही जा रही थी जिंदगी उड़ती ही जा  रही थी जिंदगी कहां, कैसे, कब पंचर हो गई कैसे उड़ने वाले मन के पंख कट गए चलना बंद कर दिया है खिलना बंद कर दिया है परिवर्तनशील चढ़ाई, उतराई और पहाड़ी गिरकर फिर से उठने, चलने, उड़ने वाली निरंतर यात्रा में खिलने वाली अमर नहीं — मुरझाने वाला फूल ही जीवन था। 

मनुष्य

  कविता मनुष्य सरण राई आदर्श के आकाश तले, अपनी-अपनी आस्था और विश्वास की धरती पर, विभिन्न स्वार्थों की छतरी तले मनुष्य अथाह भीड़ में बह रहा है। मनुष्य इस अथाह मेले में खो गया है। रेशम के कीड़े की तरह, मनुष्य अपने स्वार्थ की कोकून में कैद हो गया है। आदर्श और यथार्थ की दो समानांतर रेखाओं के बीच, घड़ी के पेंडुलम की तरह मनुष्य, कभी आदर्श की रेखा पर खड़ा होकर भाषण देता है, कभी यथार्थ की धरती पर खड़ा होकर स्वार्थ की बिगुल बजाता है। मनुष्य कितना आदर्श और कितना यथार्थ का मिश्रण है, मनुष्य कितना प्रकाश और छाया का रंगीन चित्र है, मनुष्य कितना फूल है, मनुष्य कितना पत्ता है, मनुष्य कितना कांटा है। और आदर्श के पारस से छूने पर, मनुष्य कितना सोना बन जाता है, स्वार्थ-सिद्धि की अग्नि-कुंड में जलने पर, मनुष्य कितना डरावना लोहे का हथियार बन सकता है। प्रेम की मायालु गर्माहट में पिघलकर, हिम की तरह कितना शीतल हो सकता है मनुष्य। मनुष्य अनंत रहस्य है, जीवन असीम कौतुक है, इसे भोगने की चाहत होती है। जितना भी भोगो, जीवन में नया स्वाद मिलता रहता है। जीवन प्रिय और रुचिकर होता है। ...

भिन्नता

  भिन्नता   सरण राइ  "परिवार नियोजन किए बिना आप लोगों ने इतने बच्चे पैदा कर लिए, इसलिए आप गरीब हैं!"  "नहीं। हम गरीब बाप के बच्चे हैं और गरीबों के लिए काम करने वाली सरकार, नेता और दल नहीं होने की वजह से हम गरीब हो रहे हैं।" गरीब का जवाब होता है। पत्रकार संतुष्ट नहीं होता। गरीब पत्रकार से ज्यादा जानकार?  "महाभूकंप और भारतीय नाकाबंदी से गरीबी और बढ़ रही है।"  "नहीं, भ्रष्ट और कामचोर सरकार और सरकार में बैठे नेताओं के 'दिन दूनी रात चौगुनी' कमाने की वजह से गरीबी और बढ़ रही है।" प त्रकार चकित हो जाता है। गरीब भी नेताओं की तरह बातें करने में माहिर हैं, लेकिन ये नेता क्यों नहीं बने? अगर ये नेता होते तो गरीब कहां रहते?  ये भी अमीर हो जाते। नेता और गरीब का अंतर यही है कि 'नेता गरीब नहीं रहते और नेताओं की वजह से गरीब अमीर नहीं हो पाते।'

लघुकथा फ्रेम के अंदर मुस्कुराती तस्वीर

  लघुकथा फ्रेम के अंदर मुस्कुराती तस्वीर सरण राई ज़िंदगी गरीबी और अभावों में ही बीत गई। स्वादिष्ट खाना खाने की इच्छा, अच्छे कपड़े पहनने की चाहत, और देश-विदेश घूमने का सपना कभी पूरा नहीं हुआ। किसी तरह दूसरों से मिले फटे-पुराने कपड़े पहनकर ही जीवन काटा। जब खाने को कुछ अच्छा मिलता और शादी में जाने का न्योता आता, तो वह जाने को तैयार नहीं होती थीं। कई शादियों में नहीं जाने के बाद मैंने सोचा, “वह क्यों नहीं जाना चाहतीं?” शिक्षक की मामूली तनख्वाह से महीने भर का खर्चा चलाने के लिए पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े। कई गहने तो कर्ज और ब्याज चुका न पाने के कारण खो गए। उनके पास शादी में पहनने के लिए गहने नहीं थे। औरतें शादी में गहनों से सजी-धजी चमचमाती हुई आती थीं। दोस्तों और परिचितों के सामने शर्मिंदगी होती, इसलिए वह नहीं जाती थीं। लेकिन उन्होंने कभी यह शिकायत नहीं की कि मैंने उन्हें गहने नहीं खरीदे। दादा के चौरासीवें जन्मदिन पर पिताजी ने कहा था कि मधेस आना और कैमरा साथ लाना। उन दिनों आजकल की तरह डिजिटल कैमरा नहीं था। 36 तस्वीरें खींचने वाली रील का दाम 125 रुपये था। उसे खरीदने के लिए पैसे न...