क्या कैसा?!
क्या कैसा?!
सिकुड़ते-सिकुड़ते छोटा, सूक्ष्म, अदृश्य, अगोचर हो गया हूँ
फैलते समय ब्रह्मांड से भी बड़ा, अपार विशाल हो जाता हूँ
मुझे कैसा होना चाहिए? अगोचर या अपार?!
जब अपने अंदर खोजता हूँ तो एक सम्पूर्ण, सुंदर, चमकता हीरा पाता हूँ
बाहर संसारिकता में खोजता हूँ तो रोता हुआ बेचारा बच्चा मिलता है
तो मैं क्या हूँ? हीरा या कीड़ा? या दिल के टूटे हुए टुकड़े?!

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