स्वांग
स्वांग
सरण राई
सम्भ्रांत और संपन्न समाज ने कभी उसकी और उसके योगदान की कद्र नहीं की।
वह सोचता था कि अपने समाज के लिए कुछ करेगा। उसने अपने समाज की ओर नजर दौड़ाई।
वह समाज, जो उस संपन्न समाज से बिलकुल अलग था—लूला, लंगड़ा, गूंगा, बहरे, गठिया से पीड़ित अशिक्षितों का समाज, जो हमेशा पिछड़ा हुआ था।
उस समाज को किसी की कद्र करना आता ही नहीं था।
सम्मान और सराहना की प्यास बुझाने के लिए उसने एक अधेड़ गठिया रोगी से अपना सम्मान समारोह आयोजित करवाया।
लूले, लंगड़े, गूंगे, बहरे, गठिया से पीड़ित अशिक्षित लोग वहां इकट्ठा हुए।
कार्यक्रम अराजक होना तय था। विकलांग लोग अपनी ही धुन में लगे थे।
फूल-माला पहनाने आता हुआ एक लंगड़ा व्यक्ति गिरकर घायल हो गया।
एक बेवकूफ ने वह माला पहनकर "ह्याह्याह्या" किया।
गूंगा व्यक्ति "हीहीही" करके हंसते हुए हिल गया।
बाकी लूले, लंगड़े, गूंगे, बहरे, गठिया पीड़ित अशिक्षित लोग कोई चलते, कोई गिरते-पड़ते, तो कोई चिल्लाते, हंसते रहे।
गठिया पीड़ित समाज!
यह कार्यक्रम किस चीज का था?
सम्मान पाने के लिए बैठा वह, तभी एक बेवकूफ आकर उस पर थूक देता है।
वह गुस्से में अधेड़ गठिया रोगी की ओर देखता है।
अधेड़ गठिया रोगी बस "ऊऊऊ" कर रहा होता है।
सम्मान चाहने वाला वह अपने समाज को देखकर सोचता है— "वह इस समाज के लिए काम करेगा, सम्मान के लिए नहीं।
सम्मान तो बस संपन्न समाज का एक स्वांग है।"
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