मुरझाने वाला फूल
मुरझाने वाला फूल
सरण राई
चलती ही जा रही थी जिंदगी
उड़ती ही जा रही थी जिंदगी
कहां, कैसे, कब पंचर हो गई
कैसे उड़ने वाले मन के पंख कट गए
चलना बंद कर दिया है
खिलना बंद कर दिया है
परिवर्तनशील चढ़ाई, उतराई और पहाड़ी
गिरकर फिर से उठने, चलने, उड़ने वाली
निरंतर यात्रा में खिलने वाली
अमर नहीं — मुरझाने वाला फूल ही जीवन था।

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