कविता: लेकर जाने के होगा?
कविता:
लेकर जाने के होगा?
सरण राई
मैं यहाँ इस तरह खो गया
जैसे जंगल में एक पत्ता,
जैसे मरुभूमि में एक कण,
जैसे समय के अंतराल में एक क्षण।
एक कण का क्या महत्व,
एक क्षण का क्या महत्व।
लेकिन, दोस्त,
कणों का ढेर ही तो मरुभूमि है,
क्षणों की अनवरत धारा ही समय है,
बूंदों का जमावड़ा ही समुद्र है।
मैं एक बूंद सूखकर जाने वाला,
एक कण उड़कर जाने वाला,
एक क्षण बीतकर जाने वाला।
प्रतिमा हूँ या प्रतिबिंब,
मैं...?
क्या लेकर आया था
लेकर जाना क्या होगा?
क्या लेकर जा सकूँगा?
सबकुछ यहीं था,
मेरा है यह भ्रम पाल रखा।
दोस्त,
अब भी मुझे भ्रम है,
आखिर, लेकर जाने के होगा?

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