मैं कहाँ अकेला हूँ?

 

कविता:
मैं कहाँ अकेला हूँ?
सरण राई

क्या तुम अकेले चल रहे हो?
हाँ, शायद मैं अकेला दिखता हूँ
चलते-चलते मैं अकेला हो गया और चलता रहा
अनगिनत दिशाओं में बहते हुए अलग हो गया।
भूखे-प्यासे, दुबले-पतले युवाओं के साथ चला था
खाना देखकर शायद खींचा-तानी मे बिछड़ गए हम ‍‍‍...


खाने वाले आगे निकल गए, न पाने वाले पीछे छूट गए
पेट भरने की ज़िंदगी का सहारा ढूंढते
निर्मम, निर्दयी अनवरत यात्रा के बीच में
मैं अकेला हो गया या बूढ़ा हो गया।...
चतुर लोग आगे बढ़ गए, मासूम पीछे छूट गए
इस अनवरत यात्रा में मैं अकेला हो गया।...
लेकिन, कहाँ, मैं कहाँ अकेला हूँ?

मेरे साथ चल रहे हैं
सुंदर विचार, मनोहर आस्थाएँ
कड़वे-मीठे अनुभव, समय की सीखें
मनुष्य के पवित्र, स्वच्छ, मीठे सपने
लहर कभी अकेली होती है क्या?
मेरे पास हैं मैं और मेरा
मैं अकेले का विशाल सृष्टि भंडार
मेरे चारों ओर घूमता मनोरम अदृश्य संसार
चलने वाला मैं, चलते रहने वाला मैं
मुझे चलाने वाला मैं
मैं कहाँ अकेला हूँ?
मैं अकेला एक सशक्त समूह, समुदाय, समाज।
एक संस्था, पूर्ण विवेक, अंतरात्मा की आवाज़।
सुंदर भावना, सुंदर रचना, सुंदर जीवन कहाँ अकेला होता है?

नहीं, तुम अकेले दिखते हो।
अरे हाँ, दिखने और होने में फर्क
हजारों से घिरे हुए दिखते लोग भी अकेले हैं
जिनकी अंतरात्मा मर चुकी है!
सृष्टि का सुंदर मंद-मंद जलता दीप जलाना न छोड़ने वाला मैं
अकेला जैसा दिखने वाला मैं
लहर जैसा समुद्र से
शीतल हवा से, धरती से घिरा हुआ मैं

मैं कहाँ अकेला हूँ?
सुंदर भावना, सुंदर विचार, सुंदर जीवन कहाँ अकेला होता है?

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