लघुकथा फ्रेम के अंदर मुस्कुराती तस्वीर
लघुकथा
फ्रेम के अंदर मुस्कुराती तस्वीर
सरण राई
ज़िंदगी गरीबी और अभावों में ही बीत गई। स्वादिष्ट खाना खाने की इच्छा, अच्छे कपड़े पहनने की चाहत, और देश-विदेश घूमने का सपना कभी पूरा नहीं हुआ। किसी तरह दूसरों से मिले फटे-पुराने कपड़े पहनकर ही जीवन काटा।
जब खाने को कुछ अच्छा मिलता और शादी में जाने का न्योता आता, तो वह जाने को तैयार नहीं होती थीं। कई शादियों में नहीं जाने के बाद मैंने सोचा, “वह क्यों नहीं जाना चाहतीं?” शिक्षक की मामूली तनख्वाह से महीने भर का खर्चा चलाने के लिए पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े। कई गहने तो कर्ज और ब्याज चुका न पाने के कारण खो गए। उनके पास शादी में पहनने के लिए गहने नहीं थे। औरतें शादी में गहनों से सजी-धजी चमचमाती हुई आती थीं। दोस्तों और परिचितों के सामने शर्मिंदगी होती, इसलिए वह नहीं जाती थीं। लेकिन उन्होंने कभी यह शिकायत नहीं की कि मैंने उन्हें गहने नहीं खरीदे।
दादा के चौरासीवें जन्मदिन पर पिताजी ने कहा था कि मधेस आना और कैमरा साथ लाना। उन दिनों आजकल की तरह डिजिटल कैमरा नहीं था। 36 तस्वीरें खींचने वाली रील का दाम 125 रुपये था। उसे खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए हम पति-पत्नी दादा के चौरासी में नहीं जा सके।
लाहौर में काम करने वाला मेरा छोटा भाई छुट्टी पर आने पर उसके लिए गहने खरीदकर लाता था। लेकिन अगली बार वह आता, तो बहन के नाक और कान गहनों से खाली मिलते। ऐसी स्थिति में तस्वीर खिंचवाकर फ्रेम में सजाने की कल्पना करना भी मुमकिन नहीं था।
उनके जीते-जी उनकी एक भी बड़ी तस्वीर फ्रेम में लगाकर दीवार पर नहीं टांगी जा सकी।
बीमारी के बाद तो तस्वीर खिंचवाने की ख्वाहिश भी खत्म हो गई। मधुमेह, थायराइड, उच्च रक्तचाप, किडनी की बीमारी—एक के बाद एक बीमारियों ने उन्हें घेर लिया। डायलिसिस के दौरान दिल की बीमारी और बढ़ गई। आखिरकार, बीमारियों ने उन्हें हरा दिया, और उनका निधन हो गया।
उनके गुजरने के बाद, उनके नाम पर कई श्रद्धांजलि पत्र आए, जिन्हें तस्वीर के साथ फ्रेम में रखा गया। जब भी उन फ्रेम में रखे श्रद्धांजलि पत्रों को देखता, दिल भर आता और आंखों से आंसू बहने लगते। ऐसा लगता जैसे वह मुझे हर बार रुलाने के लिए ही रह गई हों।
लेकिन इस तरह रोते रहकर जिया नहीं जा सकता।
फ्रेम में रखे गए श्रद्धांजलि पत्रों का आकार नापा और उसी के मुताबिक उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीरें प्रिंट करवाकर लाया। मैंने श्रद्धांजलि पत्रों को हटाकर फ्रेम में उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीरें लगा दीं।
जीते-जी उनकी तस्वीर फ्रेम में नहीं रख सका, लेकिन मरने के बाद कम से कम यह कर सका। अब उन फ्रेम में सजी उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीरों को देखकर मैं भी मुस्कुराने की नाकाम कोशिश करता हूं।
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