मनुष्य
कविता
मनुष्य
सरण राई
आदर्श के आकाश तले,
अपनी-अपनी आस्था और विश्वास की धरती पर,
विभिन्न स्वार्थों की छतरी तले
मनुष्य अथाह भीड़ में बह रहा है।
मनुष्य इस अथाह मेले में खो गया है।
रेशम के कीड़े की तरह,
मनुष्य अपने स्वार्थ की कोकून में कैद हो गया है।
आदर्श और यथार्थ की दो समानांतर रेखाओं के बीच,
घड़ी के पेंडुलम की तरह मनुष्य,
कभी आदर्श की रेखा पर खड़ा होकर भाषण देता है,
कभी यथार्थ की धरती पर खड़ा होकर
स्वार्थ की बिगुल बजाता है।
मनुष्य कितना आदर्श और कितना यथार्थ का मिश्रण है,
मनुष्य कितना प्रकाश और छाया का रंगीन चित्र है,
मनुष्य कितना फूल है,
मनुष्य कितना पत्ता है,
मनुष्य कितना कांटा है।
और आदर्श के पारस से छूने पर,
मनुष्य कितना सोना बन जाता है,
स्वार्थ-सिद्धि की अग्नि-कुंड में जलने पर,
मनुष्य कितना डरावना लोहे का हथियार बन सकता है।
प्रेम की मायालु गर्माहट में पिघलकर,
हिम की तरह कितना शीतल हो सकता है मनुष्य।
मनुष्य अनंत रहस्य है,
जीवन असीम कौतुक है,
इसे भोगने की चाहत होती है।
जितना भी भोगो, जीवन में
नया स्वाद मिलता रहता है।
जीवन प्रिय और रुचिकर होता है।
जीवन का पूरा स्वाद जानने के लिए,
हजार ययाति का जीवन भी अपर्याप्त होता है।
सिद्धि, मोक्ष, मुक्ति,
मानव मन की दिव्य आकांक्षा,
पक्षी की तरह उन्मुक्त आदर्श के आकाश में
उड़ना चाहता है मनुष्य।
शांतिमय, शीतल अनंत में
घूमना चाहता है मनुष्य।
प्राप्ति, उपलब्धि,
सफलता की श्रृंखला में बंधा मनुष्य,
प्रकृति के साथ खेलता है,
प्रकृति को परास्त करने का विजेता बनने का सपना देखता है।
जितना आगे बढ़ना चाहता है,
भौतिक प्रगति की हर लहर के साथ,
उपलब्धि की नाव पर सवार मनुष्य
अपने अंतर्मन की शांति के किनारे से दूर जा रहा है।
प्रेम, माया, मोह,
जीवन की सर्वोच्च स्थिति,
मनुष्य प्रेम के सागर में तैरना चाहता है,
स्वच्छंद अतुलनीय गहराई में डूबकर
जीवन का अनुभव करना चाहता है।
बिलाते हुए पानी की बूंद की तरह,
उत्कर्ष, समर्पण, विलय में जीना चाहता है।
त्याग में संतोष है,
प्राप्ति में संतोष है।
कितना त्याग और कितनी प्राप्ति का जोड़ है मनुष्य,
कितना सुख और कितना दुख का मेल है मनुष्य,
मनुष्य कितना प्रेम है,
मनुष्य कितना घृणा है,
मनुष्य कितना संघर्ष है।
और प्रेम की थपकी से मनुष्य कितना मनुष्य बनता है,
मोह के जाल में फंसकर
मनुष्य कितना जानवर हो सकता है।
पेट की आग में तपकर,
मकड़ी की तरह कितना स्वार्थी हो सकता है मनुष्य।
भूख शाश्वत यथार्थ है,
तृप्ति एक मनोहर आवश्यकता है,
इसीलिए मनुष्य कर्मवीर बना रहता है।
अतृप्त जिह्वा की तरह पूर्ण तृप्ति की खोज में
दिन-रात भटकता रहता है।
पूर्ण तृप्ति के बिंदु तक पहुंचने के लिए
हजार संसार की संपत्ति भी अपर्याप्त होती है।
सत्य, न्याय, शांति,
उच्च आराध्य सौंदर्य हैं।
ब्रह्मांड का विजेता बनना चाहता है मनुष्य,
अपनी धरती को मिसाइलों से भरकर
अंतरिक्ष में शासन करना चाहता है।
विनाश और महाविनाश का सृजन करके
अमर बनना चाहता है मनुष्य।
बारूद पर बैठकर
आग से खेल रहा है मनुष्य।
मृत्यु का ढेर लगाकर
जीवन का गीत गा रहा है मनुष्य।
और शस्त्र, शक्ति, संतुलन,
मनुष्य के हर 'अहं' के साथ
सृष्टि से बहुत दूर,
लयहीन प्रलय का निमंत्रण दे रहा है मनुष्य।
प्रलय की प्रतीक्षा करना,
बारूद पर बैठकर आग से खेलना,
मतिभ्रमित मनुष्य
अपने भविष्य की सुंदरता से दूर जा रहा है।
आदर्श की बारिश में भीगने से बचने के लिए
स्वार्थ के रंगीन छाते तले,
मनुष्य कितने समय तक
स्वार्थ की कोकून में कैद रह सकता है?
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