(लघुकथा ) सम्मान

 

लघुकथा
सम्मान
सरण राई

मैं किसी काम के सिलसिले में काठमांडू आया हूं। कई साल पहले पढ़ाए हुए एक छात्र से मेरी रोज़ मुलाकात हो रही है। मुझे देखते ही वह दूर से झुककर नमस्कार करता है। उसकी गुरु के प्रति इस तरह की श्रद्धा देखकर मैं हर्ष से गदगद हो जाता हूं।

आज भी उससे मुलाकात होती है। मैं चलने ही वाला होता हूं कि वह लगभग रास्ता रोककर कहता है, “आगे की बधाई, सर!”

“किस बात की बधाई?” मैं हैरानी से पूछता हूं।

“सुना है कि आपका नाम भावी मंत्रियों की सूची में है। सांसद तो आप हो ही चुके हैं, मंत्री बनने के बाद इस पुराने छात्र रामप्रसाद को मत भूलिएगा, सर।”

दरअसल, वह गलतफहमी में था। मेरे साथ काम करने वाले एक अन्य प्रोफेसर सांसद बने हैं। उसने जो सम्मान और घनिष्ठता दिखाई, वह उस सांसद और संभावित मंत्री के लिए थी।

उसने तो मुझे (या मेरा नाम तक) भूल ही चुका था।


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