बहकता पापी मन

 

बहकता पापी मन

सरण राई

उम्र के साथ जब ढलान पर पहुंचने लगते हैं, तो शायद ज़रूरत से ज़्यादा गैरज़रूरी खयाल दिल में हावी होने लगते हैं।
भविष्य खत्म होने को है, और अंत नज़दीक आता महसूस होने लगता है। तब अपने ही अंत की कल्पना उभरने लगती है।

मेरी मौत पर कौन ज़्यादा रोएगा?

सबसे ज़्यादा रोने वाली मेरी पत्नी तो कब की मिट्टी में मिल चुकी है।
बेटे? बहुएं?
भाई? वे भी तो सगे नहीं। जो सगे हैं, उनका रुदन बस औपचारिक होगा।
बहनें? शायद थोड़ा रोएं।
नाती-पोते? अगर और लोग रोएं, तो वे भी साथ दे देंगे।
रिश्तेदार और मित्र? भला उन्हें रोने की ज़रूरत ही क्या है!

ऐसे सोचने पर तो मुझे कोई सच्चा रोने वाला नज़र नहीं आता।

मेरी मौत के बाद मेरे बच्चे जैसे मेरी लिखी किताबें ही रोएंगी।
वे तो अभी, मेरे जीते जी भी, एक कोने में पड़ी, पाठकों के हाथों तक न पहुंच पाने के दर्द में रो ही रही हैं।
किसी के न पढ़ने के कारण भी तो रो ही रही हैं।

नहीं, मेरी एक गुप्त प्रेमिका है। वह शायद रोए। लेकिन रोएगी भी कैसे?
मेरी मौत की खबर उसे शायद कभी न मिले।
और अगर मिली भी, तो इतना समय बीत चुका होगा कि वह सोचेगी, “रोऊं या हंसूं।”

मैं खुद से पूछता हूं – मरे के बाद रोने वाले चाहिए ही क्यों?
अभी, जीते जी, जो लोग मुझे थोड़ा हंसाते हैं, जो मेरे साथ थोड़ी हंसी बांटते हैं, वे ही मेरे लिए मरने के बाद रोने वालों से बेहतर हैं।
उनके बारे में सोचना चाहिए।
मरने के बाद रोने वाले किस काम के? और आखिर क्यों चाहिए?

...अवसर-अनवसर बहकता यह पापी मन!

 


 

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