विलयन

 


विलयन

सरण राई

आज तक ज़िंदा हूँ। नहीं, अभी तक हूँ। क्या कल तक रहूंगा या अभी के कुछ ही पलों तक सांसें चलती रहेंगी या नहीं?
सोचते हुए सड़क पार कर रहा हूँ। आधुनिक आविष्कार, कहते हैं! हालात के मुताबिक़ चलने वाले, उड़ने वाले, तैरने वाले वाहन—सड़क, आसमान और समंदर में हर तरफ!
फिल्मों के परियों जैसे सुनहरे आधे मुखौटे पहने एक युवती जोर से मुझसे टकरा जाती है।
जैसे ही वह टकराई, मैं उसके भीतर विलीन हो गया।
शरीर का विसर्जन!
शायद वह वही थी? यह सोचने का मौका तक नहीं मिला।

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