-कथा ब्लैकबोर्ड, चॉक और डस्टर
कथा
ब्लैकबोर्ड, चॉक और डस्टर
सरण राई
लिखना, मिटाना, चॉक की धूल में डूब जाना।
ब्लैकबोर्ड पर लिखते-लिखते उंगलियाँ खुद चॉक बन जाती हैं।
जैसे सिर पर बर्फ़ गिर रही हो, वैसे ही चॉक की धूल बालों में जम जाती है।
चेहरे पर धूल यूँ चिपक जाती है जैसे फाल्गुन की आँधी में उड़ी मिट्टी।
धूल से ढके चेहरे में एक जोड़ी आँखें,
कक्षा के चारों ओर घूमती हैं,
फिर ब्लैकबोर्ड पर ठहर जाती हैं।
लिखे हुए अक्षर मिट जाते हैं।
एक हाथ में डस्टर, दूसरे में चॉक।
वह चिल्लाता है—और ज़ोर से, और ज़ोर से चिल्लाता है।
यह संसार है, एक छोटा-सा संसार जो हर किसी का होता है।
इसे मधुर, रमणीय और भव्य बनाने की कल्पना हर कोई करता है।
बर्फ़ पिघल जाती है, पर जैसे हिमालय से बर्फ़ कभी खाली नहीं होती,
वैसे ही जीवन कल्पनाशून्य नहीं हो सकता।
बर्फ़ का पानी बनना ही होता है।
जीवन की सुंदरता यादों में है—यादें हमेशा जीवित रहती हैं।
वह व्यक्ति सबसे महान है, जिसे अधिक लोग याद करते हैं।
ब्लैकबोर्ड पर लिखे सुंदर अक्षर मिट जाते हैं।
कौन सोच सकता है—कुछ देर पहले वहीँ सुंदर अक्षर थे।
चॉक भी जीवन जैसा है।
पूरी चॉक ब्लैकबोर्ड पर घिसते-घिसते छोटी होती जाती है,
ताकि चेतना में जीवित अर्थ को वास्तविकता में प्रकट कर सके।
बहुत छोटी होकर लिखना कठिन हो जाता है।
वह उस टुकड़े को प्यार से देखता है—
जैसे अधजला सिगरेट का ठूँठ, जिसे अनिच्छा से फेंकना पड़े।
वह चॉक का टुकड़ा फेंक देता है,
पर उसे लगता है—वह खुद भी उसी टुकड़े जैसा फेंक दिया गया है।
वह चॉक और अपने जीवन की तुलना करता है—
उसे कुछ समानताएँ दिखती हैं।
चॉक का उद्देश्य पूरा हो गया।
पर वह खुद किस उद्देश्य से बना है—यह वह नहीं जानता।
भविष्य—केवल भविष्य के प्रति आशावान विद्यार्थियों के चेहरों में
वह अपने अस्तित्व की छाया ढूँढता है।
वह ब्लैकबोर्ड पर खुद के बनाए चित्र को देखता है।
ब्लैकबोर्ड, चॉक और डस्टर—
क्या इन्हीं के साथ उसका अंत होने वाला है, वह तय नहीं कर पाता।
कमरा, विद्यार्थी, खिड़की से दिखते हरे मैदान, पेड़—
वह बिना उद्देश्य उनमें डूबकर देखता है।
बगीचे में माली मेहनत से फूलों की देखभाल कर रहा है।
फूल सबको प्रिय होते हैं,
पर फूलों में छिपे गरीब माली के श्रम और पसीने को
फूलों की सुंदरता ढक देती है।
अगर फूलों की ख़ुशबू में माली के पसीने की गंध मिले,
तो क्या लोग फूलों को पसंद करेंगे?
कक्षा के कोने में विद्यार्थियों की फुसफुसाहट
उसे वास्तविकता में लौटा देती है।
कक्षा ही उसका संसार है।
और अधिक उपयुक्त भाषा में कहें, तो उसका युद्धक्षेत्र।
उसके हथियार—चॉक, डस्टर, ब्लैकबोर्ड और आवाज़।
विद्यार्थियों की अज्ञानता उसका शत्रु।
विद्यार्थियों को समझा पाना उसकी विजय।
वह फिर पढ़ाना शुरू करता है।
पढ़ाते-पढ़ाते उसे लगता है—
वह नेता है,
हज़ारों को अपने विचारों की राह पर ले जाने की कोशिश में भाषण दे रहा है।
वह पिता है,
अपने बच्चों को ज्ञान का उपदेश दे रहा है।
वह अभिनेता है,
जो रंगमंच पर खड़ा है।
पूर्णता का अनुभव उसे कक्षा में खड़े होकर ही होता है।
उसके हाथ में चॉक और डस्टर,
पीछे ब्लैकबोर्ड,
सामने ध्यानपूर्वक सुनते विद्यार्थी।
वह दर्द और अभाव से भरी वास्तविकता से हज़ारों कोस दूर होता है।
“मुझे सरला जैसा फ़्रॉक चाहिए, पापा।”
“मुझे नीली पैंट चाहिए।”
“डॉक्टर ने जो दवा लिखी है, लाना मत भूलना।”
फ़्रॉक, पैंट, दवा—अंतहीन ज़रूरतें।
सीमित वेतन।
भौतिकवादी दुनिया में हर चाहत को वस्तु में बदलना ज़रूरी।
वह अपने परिवार से प्रेम करता है—
और उस प्रेम को फ़्रॉक और पैंट में बदल पाना चाहिए।
घर पहुँचने पर बीमार पत्नी खाँसते हुए सोई होती है।
दवा नहीं दिखती, तो चाय की बात भी नहीं उठती।
बूढ़े पिता नाराज़ कि उसने तंबाकू नहीं लाया।
बच्चों की बातें तो अलग ही हैं।
क्या शिक्षक का बेटा पढ़ नहीं सकेगा?
समझकर भी अनजान बनना पड़ता है।
जानकर भी न जानने का नाटक करना पड़ता है—
यही उसका वास्तविक संसार है।
ब्लैकबोर्ड पर लिखा चित्र डस्टर मिटा देता है।
वह फिर लिख सकता है, मिटा सकता है।
लेकिन अपने माथे पर लिखा भाग्य नहीं मिटा सकता।
कक्षा के चारों ओर नज़र दौड़ाता है—
जैसे वहाँ अपना खोया अस्तित्व खोज रहा हो।
कोई विद्यार्थी नोट्स में डूबा है,
तो कोई खिड़की से बाहर जाती आती युवतियों को देख रहा है।
वह और ज़ोर से चिल्लाता है।
चिल्लाने की आदत पड़ चुकी है।
बड़बड़ाना, बरबराना—
वह पागल-सा लगता है।
जैसे झरने की आवाज़ जिसे खुद भी सुनाई नहीं देती।
पूरी कक्षा में हँसी का फव्वारा छूटता है।
उसे लगता है—वह जोकर बन गया है।
सावधान होता है—कहीं वह सचमुच पागल तो नहीं?
वह विषय स्पष्ट करने को उदाहरण देता जाता है।
चिल्लाता जाता है।
जब उसकी आवाज़ चरम पर पहुँचती है,
उसे लगता है—
वह और बाज़ार में चिल्लाकर विज्ञापन करने वाला एक जैसे हैं।
फर्क़ बस इतना कि वह कमरे के भीतर चिल्ला रहा है,
दूसरा बीच बाज़ार में।
बूढ़े शरीर में चिल्लाने से ख़ून तेज़ बहता है,
वह खुद को जवान महसूस करने लगता है।
उसे अपना छात्र जीवन याद आता है।
उसके सहपाठी—कोई मंत्री, कोई डॉक्टर, कोई अधिकारी।
और वह—अब भी विद्यार्थियों के बीच,
विद्यार्थी जैसा दुखी।
उसके पढ़ाए विद्यार्थी भी अधिकारी बन चुके,
कई ऊँचे मकानों के मालिक बन चुके,
पर उसका वही हाल है।
आज उसे अपने छात्र जीवन की आकांक्षाएँ याद आती हैं—
कितनी ऊँची उड़ानें थीं।
दिल में चुभन होती है,
पर अब दिल की बीमारी के बाद
दिल का दर्द साधारण लगता है।
खिड़की से बाहर देखता है—
आसमान धूमिल है—बारिश की संभावना है।
वह अपनी पूरी बुद्धि, तर्कशक्ति लगाकर
विषय को स्पष्ट करने की कोशिश करता है।
यदि उसने नहीं समझाया,
तो विद्यार्थी फिर कभी नहीं समझ पाएँगे।
कक्षा के सभी विद्यार्थियों का भविष्य
उसकी मेहनत पर निर्भर है।
वह उनके भविष्य का निर्माण कर रहा है।
ज्ञान की राह पर उन्हें बढ़ा रहा है।
विद्यार्थियों को समझा पाना ही उसकी साधना है।
वरना उसके ज्ञान का कोई अर्थ नहीं।
वह चिल्लाता जाता है।
गले की नसें फूल जाती हैं।
घंटी बजती है।
हमेशा की तरह चॉक और हाजिरी रजिस्टर हाथ में दबाकर
वह कक्षा से बाहर निकलता है।
उसे लगता है—गला सूख रहा है।
पानी पीता है।
कुछ पुरानी किताबें दबाकर
तेज़ी से घर की ओर चलता है।
बारिश होने वाली है,
इसलिए सभी लोग जल्दी-जल्दी जा रहे हैं।
लेकिन जब लोग उसे देखते हैं,
सड़क पर मुस्कुराने लगते हैं।
वह खुद को देखता है—
कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं?
कोट और जूते पर चॉक की सफ़ेद धूल।
टकटकाता है—
कहाँ आसानी से झड़ेगी!
उसे याद आता है—फ़्रॉक, पैंट और दवा।
जेब टटोलता है—खाली।
उसे खाली हाथ लौटना है—
वह लौट आता है।
उसे लगता है—
लोग अब भी उसे देखकर हँस रहे हैं।
मानो ब्लैकबोर्ड पर रंग-बिरंगी चॉक से
बना हुआ कोई हास्य-चित्र हो।
या पूरा ब्लैकबोर्ड ही हो—
जिस पर व्यंग्यचित्र बने हों,
जिन्हें देखकर हर कोई हँसे।
वह—ब्लैकबोर्ड, चॉक और डस्टर।
लोगों की कठोर नज़रों से बचने के लिए
वह और तेज़ चलता है।
स्पन्दन, अंक १, वर्ष १ (२०३४)
यदि आप चाहें, तो मैं इस कथा का भावानुवाद भी कर सकता हूँ,
ताकि यह और प्रवाहपूर्ण हिंदी में साहित्यिक रूप से सुंदर लगे।
क्या आप चाहते हैं कि मैं ऐसा कर दूँ?
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