फ्रेम में मुस्कुराती तस्वीर

 

फ्रेम में मुस्कुराती तस्वीर

 

ज़िंदगी गरीबी और अभावों में ही गुज़र गई। स्वादिष्ट खाना खाने की इच्छा, अच्छे कपड़े पहनने की ख्वाहिश और देश-विदेश घूमने का सपना कभी पूरा नहीं हुआ। एक तरह से दूसरों के दिए हुए सामानों के सहारे ही जीवन बीता।
जब भी शादी में खाने का न्योता मिलता और मैंने कहा, "चलो, शादी में चलते हैं," वह जाने को तैयार नहीं होती थीं। कई शादियों में न जाने के बाद मैंने सोचा, "आखिर क्यों नहीं जातीं?"
शिक्षक की कम तनख्वाह में महीनेभर का खर्च चलाने के लिए उनकी ज़ेवरात गिरवी रखने पड़े। कई ज़ेवर तो ब्याज समेत चुकाने में असमर्थता के कारण हमेशा के लिए चले गए। शादी में जाने के लिए ज़ेवर नहीं थे। औरतें शादियों में ज़ेवर पहनकर आतीं और सबकी नज़रें उन्हीं पर होतीं। उन्हें लगा होगा कि दोस्तों और रिश्तेदारों के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी। इसलिए वह नहीं जाती थीं। लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की कि "तुमने मेरे लिए कभी गहने क्यों नहीं खरीदे।"

दादाजी के चौसठे (84वें जन्मदिन) के मौके पर पिता ने कहा था, "कैमरा लेकर मधेस आओ।" उन दिनों आजकल की तरह डिजिटल कैमरे नहीं होते थे। 36 तस्वीरें खींचने वाले रील का दाम 125 रुपये था। इतना पैसा नहीं था, इसलिए दादाजी के चौसठे में हम पति-पत्नी जा नहीं सके।

लाहौर में रहने वाले भाई छुट्टी में आते, तो गहने खरीदकर दे देते, लेकिन अगली बार आते, तो देखते कि बहन के नाक-कान बिना ज़ेवर के होते। ऐसी हालत में फोटो खिंचवाकर फ्रेम में सजाने की कल्पना करना भी असंभव था। जब तक वह जीवित थीं, उनकी एक भी बड़ी तस्वीर फ्रेम में सजाकर नहीं लगा सका।

बीमारी ने उनकी तस्वीर खिंचवाने की इच्छा भी खत्म कर दी। मधुमेह, थायराइड, उच्च रक्तचाप, किडनी की बीमारी... डायलिसिस के दौरान दिल की बीमारी भी जुड़ गई। आखिरकार, बीमारियों ने उन्हें हरा दिया, और उनका निधन हो गया।

उनके निधन के बाद, फ्रेम में उनकी तस्वीर के साथ श्रद्धांजलि पत्रों का अंबार लग गया। जब भी उन फ्रेमों और पत्रों को देखता हूं, मन भर आता है। आखिरकार, वह रुलाकर ही मानते हैं।
पर, इस तरह रोते रहकर जिया नहीं जा सकता।

अब, श्रद्धांजलि पत्रों को फ्रेम से निकालकर उनके आकार में उनकी मुस्कुराती तस्वीरें प्रिंट करवाता हूं। उन तस्वीरों को फ्रेम में सजाता हूं।

जीते जी उनकी मुस्कुराती तस्वीर फ्रेम में नहीं सजा पाया। लेकिन मरने के बाद, कम से कम उनकी मुस्कुराती तस्वीरें फ्रेम में लगा देता हूं। और उन फ्रेम में सजी मुस्कुराती तस्वीरों को देखकर, मैं खुद को मुस्कुराने की असफल कोशिश करता हूं।

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